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सामान्य हिंदी

Syllabus head (ii) — Hindi and English language skills | Chapter 11 of 18

60practice questions
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पूर्व-अपेक्षाएँ


कारक (Case / विभक्ति)

A.1 परिभाषा और नियम

कारक = संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जिससे उसका क्रिया के साथ संबंध प्रकट हो। यह संबंध जिन चिह्नों (परसर्गों) से व्यक्त होता है, उन्हें विभक्ति-चिह्न या परसर्ग कहते हैं (ने, को, से, का, में, पर आदि)।

हिंदी में 8 कारक माने जाते हैं —

क्र. कारक विभक्ति-चिह्न अर्थ/कार्य पहचान-प्रश्न
1 कर्ता ने (या शून्य) क्रिया को करने वाला क्रिया कौन करता है?
2 कर्म को (या शून्य) जिस पर क्रिया का फल पड़े क्या/किसे (क्रिया का फल)?
3 करण से, के द्वारा जिस साधन से क्रिया हो किस साधन/माध्यम से?
4 संप्रदान को, के लिए जिसके लिए क्रिया हो / जिसे कुछ दिया जाए किसके लिए? किसे दिया?
5 अपादान से (अलगाव) जिससे कोई वस्तु अलग हो किससे अलग हुआ?
6 संबंध का, की, के; रा, री, रे संज्ञा का संज्ञा से संबंध किसका/किसकी/किसके?
7 अधिकरण में, पर क्रिया का स्थान/समय/आधार कहाँ? किसमें? किस पर?
8 संबोधन हे! अरे! ओ! पुकारने/बुलाने का भाव किसे पुकारा गया?

स्मरण-सूत्र (क्रम याद रखने हेतु): "कर्ता कर्म करण संप्रदान, अपादान संबंध अधिकरण संबोधन" — अथवा लोकप्रिय दोहा: "कर्ता ने अरु कर्म को, करण रीति से जान। संप्रदान को, के लिए, अपादान से मान॥ का, के, की संबंध हैं, अधिकरण में, पर मान। रे! हे! हो! संबोधन, मित्र धरहु यह ध्यान॥"

A.2 प्रत्येक कारक — संक्षिप्त टिप्पणी

A.3 दस उदाहरण-वाक्य (कारक-पहचान सहित)

वाक्य रेखांकित पद कारक
राम ने रावण को मारा। ने / को कर्ता / कर्म
बच्चा छत से गिर पड़ा। से अपादान (अलगाव)
वह कलम से पत्र लिखता है। से करण (साधन)
सेठ ने भिखारी को कंबल दिया। को संप्रदान (देने का भाव)
शिक्षिका ने छात्र को बुलाया। को कर्म (फल छात्र पर)
यह सोने की अँगूठी है। की संबंध
मेज़ पर पुस्तकें रखी हैं। पर अधिकरण
हे ईश्वर! सबका भला करो। हे संबोधन
गरीबों के लिए वस्त्र लाओ। के लिए संप्रदान
वह बस से विद्यालय जाता है। से करण (माध्यम)

A.4 दो प्रसिद्ध जाल (Traps)

जाल 1 — 'से' : करण या अपादान? दोनों का चिह्न 'से' है। कसौटी —

जाल 2 — 'को' : कर्म या संप्रदान? दोनों का चिह्न 'को' है। कसौटी —

परीक्षक की दृष्टि: प्रश्न प्रायः इसी रूप में आता है — "निम्न वाक्य में 'से' किस कारक का चिह्न है?" और विकल्पों में करण तथा अपादान दोनों रखे जाते हैं। पहले क्रिया देखें: गिरना, निकलना, डरना, अलग होना → अपादान; लिखना, काटना, जाना (साधन से) → करण। इसी तरह 'को' वाले प्रश्न में "देना/लाना/भेजना (किसी के लिए)" दिखे तो संप्रदान चुनें।


संधि (Euphonic Combination)

B.1 परिभाषा

दो वर्णों (ध्वनियों) के मेल से होने वाला विकार संधि कहलाता है — संधि = सम् + धि (मेल)। जुड़े हुए शब्द को पुनः अलग करना संधि-विच्छेद कहलाता है। संधि तीन प्रकार की होती है —

  1. स्वर संधि — स्वर + स्वर का मेल
  2. व्यंजन संधि — व्यंजन + स्वर/व्यंजन का मेल
  3. विसर्ग संधि — विसर्ग (ः) + स्वर/व्यंजन का मेल

B.2 स्वर संधि के पाँच भेद

(1) दीर्घ संधि — नियम: समान स्वर (ह्रस्व या दीर्घ) मिलें तो दीर्घ हो जाता है: अ/आ + अ/आ → ; इ/ई + इ/ई → ; उ/ऊ + उ/ऊ →

संधि-विच्छेद संधि-रूप योग
विद्या + आलय विद्यालय आ + आ = आ
हिम + आलय हिमालय अ + आ = आ
विद्या + अर्थी विद्यार्थी आ + अ = आ
परम + अर्थ परमार्थ अ + अ = आ
रवि + इंद्र रवींद्र इ + इ = ई
गिरि + ईश गिरीश इ + ई = ई
सु + उक्ति सूक्ति उ + उ = ऊ
भानु + उदय भानूदय उ + उ = ऊ

(2) गुण संधि — नियम: अ/आ के बाद इ/ई → ए, उ/ऊ → ओ, ऋ → अर् हो जाता है।

संधि-विच्छेद संधि-रूप योग
नर + इंद्र नरेंद्र अ + इ = ए
सुर + इंद्र सुरेंद्र अ + इ = ए
महा + ईश महेश आ + ई = ए
रमा + ईश रमेश आ + ई = ए
महा + उत्सव महोत्सव आ + उ = ओ
सूर्य + उदय सूर्योदय अ + उ = ओ
महा + ऋषि महर्षि आ + ऋ = अर्
देव + ऋषि देवर्षि अ + ऋ = अर्

(3) वृद्धि संधि — नियम: अ/आ के बाद ए/ऐ → ऐ, ओ/औ → औ हो जाता है।

संधि-विच्छेद संधि-रूप योग
एक + एक एकैक अ + ए = ऐ
सदा + एव सदैव आ + ए = ऐ
मत + ऐक्य मतैक्य अ + ऐ = ऐ
महा + ऐश्वर्य महैश्वर्य आ + ऐ = ऐ
जल + ओघ जलौघ अ + ओ = औ
महा + औषध महौषध आ + औ = औ
वन + ओषधि वनौषधि अ + ओ = औ

(4) यण संधि — नियम: इ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद कोई भिन्न (असवर्ण) स्वर आए तो क्रमशः य्, व्, र् हो जाता है।

संधि-विच्छेद संधि-रूप योग
अति + अधिक अत्यधिक इ + अ = य
इति + आदि इत्यादि इ + आ = या
प्रति + एक प्रत्येक इ + ए = ये
अधि + अयन अध्ययन इ + अ = य
सु + आगत स्वागत उ + आ = वा
अनु + एषण अन्वेषण उ + ए = वे
पितृ + आज्ञा पित्राज्ञा ऋ + आ = रा

(5) अयादि संधि — नियम: ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई स्वर आए तो क्रमशः अय्, आय्, अव्, आव् हो जाता है।

संधि-विच्छेद संधि-रूप योग
ने + अन नयन ए + अ = अय्
चे + अन चयन ए + अ = अय्
शे + अन शयन ए + अ = अय्
गै + अक गायक ऐ + अ = आय्
पो + अन पवन ओ + अ = अव्
भो + अन भवन ओ + अ = अव्
पौ + अक पावक औ + अ = आव्
नौ + इक नाविक औ + इ = आव्

B.3 व्यंजन संधि (प्रमुख उदाहरण)

नियम अनेक हैं; परीक्षा के लिए उदाहरण-आधारित पहचान ही पर्याप्त है — जोड़ पर व्यंजन का बदलना ही व्यंजन संधि का लक्षण है।

संधि-विच्छेद संधि-रूप परिवर्तन
सत् + जन सज्जन त् + ज = ज्ज
उत् + लेख उल्लेख त् + ल = ल्ल
सम् + तोष संतोष म् → अनुस्वार (ं)
सम् + गम संगम म् → अनुस्वार
सम् + कल्प संकल्प म् → अनुस्वार
दिक् + गज दिग्गज क् + ग = ग्ग
जगत् + ईश जगदीश त् + स्वर = द
वाक् + ईश वागीश क् + स्वर = ग
उत् + नति उन्नति त् + न = न्न
सत् + मार्ग सन्मार्ग त् + म = न्म
उत् + हार उद्धार त् + ह = द्ध
परि + छेद परिच्छेद स्वर के बाद छ = च्छ

B.4 विसर्ग संधि (प्रमुख उदाहरण)

संधि-विच्छेद संधि-रूप नियम-संकेत
निः + चय निश्चय विसर्ग + च/छ → श्
निः + छल निश्छल विसर्ग + च/छ → श्
दुः + कर दुष्कर इ/उ के बाद विसर्ग + क/ख/प/फ → ष्
निः + फल निष्फल वही नियम
निः + कपट निष्कपट वही नियम
मनः + योग मनोयोग अ के बाद विसर्ग + घोष वर्ण → ओ
मनः + बल मनोबल वही नियम
तपः + वन तपोवन वही नियम
यशः + गान यशोगान वही नियम
निः + धन निर्धन इ/उ के बाद विसर्ग + घोष वर्ण → र्
दुः + गम दुर्गम वही नियम
दुः + उपयोग दुरुपयोग वही नियम
नमः + कार नमस्कार विसर्ग → स् (नमस्कार, पुरस्कार आदि)
पुरः + कार पुरस्कार वही नियम

B.5 संधि-विच्छेद अभ्यास (स्वयं करें, फिर मिलान करें)

शब्द विच्छेद संधि
परोपकार पर + उपकार गुण
यथेष्ट यथा + इष्ट गुण
हिमालय हिम + आलय दीर्घ
सूर्योदय सूर्य + उदय गुण
सदैव सदा + एव वृद्धि
प्रत्युत्तर प्रति + उत्तर यण
गायन गै + अन अयादि
उज्ज्वल उत् + ज्वल व्यंजन
निस्संदेह निः + संदेह विसर्ग
महर्षि महा + ऋषि गुण

(नोट: कुछ शब्दों — जैसे 'स्वागत' बनाम 'स्वच्छ' — के विच्छेद पुस्तक-भेद से भिन्न मिलते हैं; विवादित शब्द परीक्षा में प्रायः नहीं पूछे जाते। मानक, निर्विवाद उदाहरण ही कंठस्थ करें।)

परीक्षक की दृष्टि: दो ही ढंग से पूछा जाता है — (1) शब्द देकर सही संधि-विच्छेद पूछना (विकल्पों में जोड़ की सीमा इधर-उधर की होती है: विद्या+आलय ✔ बनाम विद्य+आलय ✘), (2) शब्द देकर संधि का नाम पूछना। दूसरे प्रकार के लिए तुरंत-सूत्र: जोड़ पर ए/ओ/अर् दिखे → गुण; ऐ/औ → वृद्धि; य/व/र + स्वर → यण; अय/आय/अव/आव → अयादि; दीर्घ स्वर (आ/ई/ऊ) → दीर्घ। शेष में व्यंजन बदले → व्यंजन संधि; मूल में विसर्ग (निः, दुः, मनः, तपः, यशः, नमः) → विसर्ग संधि।


समास (Compound Formation)

C.1 परिभाषा

दो या अधिक शब्दों (पदों) का संक्षेप में मेल समास कहलाता है; बीच की विभक्तियाँ/योजक लुप्त हो जाते हैं। सामासिक शब्द को खोलकर लिखना समास-विग्रह कहलाता है (राजकुमार → राजा का कुमार)। संधि वर्णों का मेल है, समास पदों का — यही दोनों का मूल अंतर है।

कौन-सा पद प्रधान है — इसी आधार पर 6 भेद याद रखें:

समास प्रधान पद झट-पहचान
अव्ययीभाव पूर्व पद (अव्यय) यथा-, प्रति-, आ-, भर-, अनु- से आरंभ; पूरा पद अव्यय बन जाता है
तत्पुरुष उत्तर पद विग्रह में को/से/के लिए/का/में जैसी विभक्ति लौटती है
कर्मधारय उत्तर पद विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय ("नीला कमल", "चंद्र जैसा मुख")
द्विगु उत्तर पद पहला पद संख्यावाचक; समूह का बोध
द्वंद्व दोनों पद विग्रह में "और/या/अथवा" लगता है; प्रायः बीच में योजक-चिह्न (-)
बहुव्रीहि कोई नहीं (अन्य पद प्रधान) विग्रह "जिसका/जिसके... वह" से बने; तीसरे का बोध

C.2 छह भेद — परिभाषा और विग्रह-सहित उदाहरण

(1) अव्ययीभाव — पहला पद अव्यय और प्रधान; पूरा सामासिक पद क्रिया-विशेषण (अव्यय) का काम करता है।

पद विग्रह
यथाशक्ति शक्ति के अनुसार
यथासंभव जैसा संभव हो
आजीवन जीवन-भर
आमरण मृत्यु तक
प्रतिदिन प्रत्येक दिन
भरपेट पेट भरकर

(2) तत्पुरुष — उत्तर (दूसरा) पद प्रधान; विग्रह में कारक-विभक्ति (को, से, के लिए, से/का, में/पर) लुप्त रहती है। विभक्ति के नाम पर उपभेद बनते हैं —

पद विग्रह उपभेद
ग्रामगत ग्राम को गया कर्म तत्पुरुष (को)
शरणागत शरण को आया कर्म तत्पुरुष
हस्तलिखित हाथ से लिखित करण तत्पुरुष (से)
तुलसीकृत तुलसी द्वारा कृत करण तत्पुरुष
रसोईघर रसोई के लिए घर संप्रदान तत्पुरुष (के लिए)
देशनिकाला देश से निकाला अपादान तत्पुरुष (से — अलगाव)
राजकुमार राजा का कुमार संबंध तत्पुरुष (का)
सेनापति सेना का पति (स्वामी) संबंध तत्पुरुष
वनवास वन में वास अधिकरण तत्पुरुष (में)
आपबीती अपने (आप) पर बीती अधिकरण तत्पुरुष

(3) कर्मधारय — विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का मेल; उत्तर पद प्रधान। (कर्मधारय वस्तुतः तत्पुरुष का ही उपभेद माना जाता है, पर परीक्षा में अलग भेद के रूप में पूछा जाता है।)

पद विग्रह
नीलकमल नीला (है जो) कमल
महात्मा महान आत्मा
महापुरुष महान पुरुष
परमानंद परम आनंद
चंद्रमुख चंद्र के समान मुख
घनश्याम घन (बादल) के समान श्याम

(4) द्विगु — पहला पद संख्यावाचक विशेषण; समूह (समाहार) का बोध।

पद विग्रह
त्रिलोक तीन लोकों का समाहार
नवरात्र नौ रात्रियों का समाहार
चौराहा चार राहों का समाहार
सप्ताह सात दिनों का समाहार
पंचवटी पाँच वट-वृक्षों का समाहार
शताब्दी सौ वर्षों का समाहार

(5) द्वंद्व — दोनों पद प्रधान; विग्रह में "और/तथा/या" जुड़ता है।

पद विग्रह
माता-पिता माता और पिता
दिन-रात दिन और रात
सुख-दुख सुख और दुख
भाई-बहन भाई और बहन
अन्न-जल अन्न और जल
ऊँच-नीच ऊँच या नीच

(6) बहुव्रीहि — कोई भी पद प्रधान नहीं; दोनों मिलकर किसी तीसरे (अन्य) का संकेत करते हैं। विग्रह "जिसका/जिसके/जिसमें... वह" के ढाँचे में बनता है।

पद विग्रह संकेतित अर्थ
पीतांबर पीत (पीला) है अंबर (वस्त्र) जिसका विष्णु/श्रीकृष्ण
दशानन दस हैं आनन (मुख) जिसके रावण
लंबोदर लंबा है उदर जिसका गणेश
नीलकंठ नीला है कंठ जिसका शिव
चतुर्भुज चार हैं भुजाएँ जिसकी विष्णु
चक्रपाणि चक्र है पाणि (हाथ) में जिसके विष्णु
त्रिनेत्र तीन हैं नेत्र जिसके शिव
गजानन गज के समान आनन है जिसका गणेश

C.3 कर्मधारय vs बहुव्रीहि — प्रसिद्ध जाल

एक ही पद विग्रह के अनुसार दो समास हो सकता है —

परीक्षक की दृष्टि: समास के प्रश्न में सबसे पहले विग्रह मन में बनाइए। विकल्पों में कर्मधारय और बहुव्रीहि साथ हों तो देखें कि पद किसी प्रसिद्ध व्यक्ति (शिव, विष्णु, गणेश, रावण) का पर्याय है या नहीं — है तो बहुव्रीहि। "यथा/आ/प्रति/भर" से शुरू हो तो बिना सोचे अव्ययीभाव; संख्या से शुरू हो और समूह-बोध हो तो द्विगु; योजक-चिह्न और "और" से विग्रह बने तो द्वंद्व।


उपसर्ग और प्रत्यय (Prefixes & Suffixes)

D.1 उपसर्ग

उपसर्ग = जो शब्दांश किसी शब्द के पहले जुड़कर उसका अर्थ बदल दे या उसमें विशेषता ला दे (उप = समीप, सर्ग = सृष्टि)। जैसे — हार से प्रहार, हार, विहार, उपहार।

प्रमुख संस्कृत उपसर्ग (अर्थ और उदाहरण सहित):

उपसर्ग अर्थ उदाहरण
अभाव, निषेध अज्ञान, अधर्म, अचल
अनु पीछे, समान अनुज, अनुकरण, अनुशासन
अप बुरा, हीन, विपरीत अपमान, अपयश, अपशब्द
अभि सामने, पास, ओर अभिमान, अभियोग, अभिमुख
अव नीचे, हीन अवगुण, अवनति, अवतरण
तक, ओर, उलटा आजीवन, आगमन, आरोहण
उत् (उद्) ऊपर, श्रेष्ठ उत्थान, उत्कर्ष, उन्नति, उद्गम
उप निकट, गौण, सहायक उपकार, उपवन, उपाध्यक्ष
दुर् / दुस् बुरा, कठिन दुर्जन, दुर्गम, दुष्कर, दुस्साहस
नि भीतर, नीचे, अधिकता नियम, निवास, निषेध
निर् / निस् बिना, बाहर, निषेध निर्धन, निर्दोष, निश्चल, निस्संदेह
परा उलटा, पीछे, पराजय-भाव पराजय, पराभव, पराक्रम
परि चारों ओर, पूर्ण परिक्रमा, परिवार, परिपूर्ण
प्र आगे, अधिक, श्रेष्ठ प्रबल, प्रस्थान, प्रगति
प्रति विरुद्ध, सामने, प्रत्येक प्रतिकूल, प्रतिदिन, प्रत्यक्ष
वि विशेष, भिन्न, अभाव विज्ञान, वियोग, विदेश
सम् पूर्ण, साथ, अच्छी तरह संयोग, संगम, संस्कार, सम्मान
सु अच्छा, सरल, अधिक सुगम, सुपुत्र, स्वागत (सु + आगत)

(अन्य प्रचलित संस्कृत उपसर्ग: अति = अधिक/परे — अत्यधिक, अत्याचार; अधि = ऊपर/प्रधान — अधिकार, अध्यक्ष; कु = बुरा — कुपुत्र, कुकर्म; अपि, अन् आदि।)

हिंदी/देशज उपसर्ग: अन (अभाव — अनपढ़, अनजान), अध (आधा — अधपका, अधजला), नि (रहित — निडर, निकम्मा), भर (पूरा — भरपेट, भरपूर), दु (कम/बुरा — दुबला)।

उर्दू-फ़ारसी उपसर्ग:

उपसर्ग अर्थ उदाहरण
बे बिना बेईमान, बेकार, बेवक्त
ला बिना, नहीं लापता, लाजवाब, लापरवाह
बद बुरा बदनाम, बदमाश, बदबू
हम साथ, समान हमदर्द, हमसफ़र, हमउम्र
खुश अच्छा, प्रसन्न खुशबू, खुशहाल, खुशकिस्मत
कम थोड़ा कमज़ोर, कमसिन
गैर निषेध, भिन्न गैरहाज़िर, गैरकानूनी
ना अभाव नालायक, नासमझ, नापसंद

D.2 प्रत्यय

प्रत्यय = जो शब्दांश शब्द के अंत में जुड़े। दो वर्ग —

(क) कृत् प्रत्ययधातु (क्रिया) के अंत में जुड़ते हैं; बना शब्द कृदंत कहलाता है।

प्रत्यय उदाहरण (धातु → शब्द)
अक लिख् → लेखक; पठ् → पाठक; गै → गायक
अन लिख् → लेखन; पठ् → पठन; गम् → गमन
अनीय पठ् → पठनीय; कृ → करणीय; दृश् → दर्शनीय
पूज् → पूज्य; खाद् → खाद्य
ता (व्य) कृ → कर्तव्य; दा → दातव्य
आई (हिंदी) लड़ना → लड़ाई; पढ़ना → पढ़ाई
आवट (हिंदी) सजाना → सजावट; मिलाना → मिलावट
आहट (हिंदी) घबराना → घबराहट; चिल्लाना → चिल्लाहट

(ख) तद्धित प्रत्ययसंज्ञा, सर्वनाम या विशेषण के अंत में जुड़ते हैं।

प्रत्यय उदाहरण (शब्द → नया शब्द)
इक धर्म → धार्मिक; समाज → सामाजिक; इतिहास → ऐतिहासिक
धन → धनी; लोभ → लोभी; गुण → गुणी
ता मनुष्य → मनुष्यता; सुंदर → सुंदरता
त्व गुरु → गुरुत्व; मनुष्य → मनुष्यत्व
मान / वान बुद्धि → बुद्धिमान; धन → धनवान
इमा लघु → लघिमा; गुरु → गरिमा; लाल → लालिमा
एरा चाचा → चचेरा; मामा → ममेरा
आर / कार (वृत्ति-बोधक) सोना → सुनार; लोहा → लुहार; पत्र → पत्रकार

कृत् vs तद्धित की कसौटी: मूल शब्द क्रिया/धातु है → कृत् (लेखक, पढ़ाई); मूल शब्द संज्ञा/विशेषण है → तद्धित (धार्मिक, धनवान)।

परीक्षक की दृष्टि: प्रायः पूछा जाता है — "अमुक शब्द में कौन-सा उपसर्ग है?" जाल यह कि शब्द में उपसर्ग संधि करके छिपा होता है: स्वागत में 'सु' (सु + आगत), उन्नति में 'उत्' (उत् + नति), निश्चल में 'निस्'। दूसरा पैटर्न — "किस शब्द में तद्धित प्रत्यय है?" तब मूल शब्द पहचानें: 'पढ़ाई' (क्रिया से → कृत्) बनाम 'भलाई' (विशेषण 'भला' से → तद्धित)।


तत्सम और तद्भव शब्द

E.1 परिभाषा

E.2 परीक्षा-स्तरीय 60 जोड़े

तत्सम तद्भव तत्सम तद्भव
अग्नि आग अक्षि आँख
अश्रु आँसू आम्र आम
उष्ट्र ऊँट उलूक उल्लू
कर्ण कान कर्पूर कपूर
कार्य काज कूप कुआँ
कृषक किसान कोकिल कोयल
क्षेत्र खेत क्षीर खीर
गृह घर ग्राम गाँव
गौ गाय घृत घी
घोटक घोड़ा चंद्र चाँद
चतुर्थ चौथा चर्म चमड़ा
जिह्वा जीभ ज्येष्ठ जेठ
तैल तेल दंत दाँत
दधि दही दीप दीया
दुग्ध दूध धैर्य धीरज
निद्रा नींद नव नया
पक्ष पंख पत्र पत्ता
पुत्र पूत पुष्प फूल
पृष्ठ पीठ प्रस्तर पत्थर
भक्त भगत भ्राता भाई
मयूर मोर मस्तक माथा
मुख मुँह मृत्यु मौत
रात्रि रात लौह लोहा
वत्स बछड़ा वधू बहू
वानर बंदर शत सौ
शर्करा शक्कर शय्या सेज
श्रावण सावन सत्य सच
सप्त सात सर्प साँप
सूचि सुई सूर्य सूरज
स्वर्ण सोना हस्त हाथ

परीक्षक की दृष्टि: दो पैटर्न — (1) "निम्न में से तत्सम शब्द कौन-सा है?" (तीन तद्भव + एक तत्सम), (2) किसी तद्भव का तत्सम रूप पूछना। भ्रम फैलाने के लिए मिलते-जुलते जोड़े रखे जाते हैं (सूर्य-सूरज, श्रावण-सावन)। नियम याद रखें: संस्कृत-छाप वाला रूप तत्सम है, प्रचलित बोलचाल का रूप तद्भव।


पर्यायवाची शब्द (Synonyms)

समान अर्थ देने वाले शब्द पर्यायवाची कहलाते हैं। परीक्षा में या तो किसी शब्द का पर्याय पूछा जाता है, या चार में से वह शब्द जो पर्याय नहीं है।

F.1 परीक्षा-स्तरीय 40 शब्द-समूह

शब्द पर्यायवाची
सूर्य रवि, दिनकर, भास्कर, आदित्य, सविता
चंद्रमा शशि, इंदु, राकेश, सुधाकर, हिमांशु
जल नीर, वारि, सलिल, तोय, अंबु
अग्नि पावक, अनल, हुताशन, वह्नि, कृशानु
पवन वायु, समीर, अनिल, मारुत, प्रभंजन
आकाश नभ, गगन, अंबर, व्योम, अंतरिक्ष
पृथ्वी धरा, वसुधा, भूमि, वसुंधरा, मही
पर्वत गिरि, शैल, नग, अचल, भूधर
नदी सरिता, तटिनी, तरंगिणी, आपगा, निर्झरिणी
समुद्र सागर, सिंधु, जलधि, रत्नाकर, वारिधि
कमल पंकज, जलज, सरोज, नलिन, अरविंद
घर गृह, सदन, भवन, आलय, निकेतन
हाथी गज, हस्ती, कुंजर, द्विरद, मतंग
घोड़ा अश्व, हय, तुरंग, वाजि, घोटक
सिंह केसरी, मृगराज, वनराज, शार्दूल, मृगेंद्र
स्त्री नारी, महिला, वनिता, कामिनी, रमणी
राजा नृप, नरेश, भूपति, महीप, नरेंद्र
वृक्ष तरु, विटप, पादप, द्रुम, पेड़
पक्षी खग, विहग, नभचर, अंडज, पखेरू
रात रात्रि, रजनी, निशा, यामिनी, विभावरी
दिन दिवस, वासर, वार, दिवा
फूल पुष्प, सुमन, कुसुम, प्रसून
मित्र सखा, सहचर, मीत, सुहृद
शत्रु रिपु, अरि, वैरी, प्रतिपक्षी, दुश्मन
माता जननी, माँ, अंबा, जनयित्री
पिता जनक, तात, पितृ, जन्मदाता
गुरु शिक्षक, आचार्य, उपाध्याय, अध्यापक
ईश्वर प्रभु, परमात्मा, परमेश्वर, जगदीश, भगवान
गंगा भागीरथी, जाह्नवी, सुरसरि, देवनदी, मंदाकिनी
बादल मेघ, घन, जलद, पयोद, नीरद
अमृत सुधा, पीयूष, अमिय, सोम
असुर दानव, दैत्य, राक्षस, निशाचर
आँख नेत्र, नयन, लोचन, चक्षु, दृग
इंद्र देवराज, सुरपति, पुरंदर, देवेंद्र, मघवा
वस्त्र कपड़ा, चीर, पट, वसन, अंबर
किरण रश्मि, कर, अंशु, मयूख, मरीचि
तालाब सरोवर, तड़ाग, जलाशय, सर, पुष्कर
पुत्र बेटा, सुत, तनय, आत्मज, नंदन
पुत्री बेटी, सुता, तनया, आत्मजा, दुहिता
बिजली विद्युत, चपला, चंचला, दामिनी, तड़ित

परीक्षक की दृष्टि: "पर्याय नहीं है" वाले प्रश्न में गलत विकल्प प्रायः मिलते-जुलते विषय का पर्याय होता है — जैसे समुद्र के पर्यायों में 'जलद' (बादल), सूर्य के पर्यायों में 'सुधाकर' (चंद्रमा), कमल के पर्यायों में 'जलधि' (समुद्र)। 'अंबर' (आकाश/वस्त्र) और 'कर' (हाथ/किरण) जैसे द्विअर्थी शब्दों से भी विकल्प बनते हैं।


विलोम शब्द (Antonyms)

विपरीत/उल्टा अर्थ देने वाला शब्द विलोम (विपर्यायवाची) कहलाता है। नियम-संकेत: कई विलोम उपसर्ग बदलकर बनते हैं — सु/दुर् (सुगम-दुर्गम), आ/निर् (आस्था-अनास्था), उत्/अप (उत्कर्ष-अपकर्ष), अनु/प्रति (अनुकूल-प्रतिकूल), स/निर् (सगुण-निर्गुण)।

G.1 परीक्षा-स्तरीय 60 जोड़े

शब्द विलोम शब्द विलोम
आदि अंत अथ इति
अग्रज अनुज अल्पज्ञ बहुज्ञ
आस्तिक नास्तिक अनुराग विराग
अनुकूल प्रतिकूल अनुलोम प्रतिलोम
आय व्यय आरोह अवरोह
आकर्षण विकर्षण आदान प्रदान
आविर्भाव तिरोभाव आर्द्र शुष्क
उत्थान पतन उत्कर्ष अपकर्ष
उन्नति अवनति उपकार अपकार
उर्वर ऊसर उदार कृपण
ऋजु वक्र एकाग्र चंचल
कृतज्ञ कृतघ्न कठोर कोमल
कनिष्ठ ज्येष्ठ क्रय विक्रय
क्षणिक शाश्वत गुप्त प्रकट
ग्राह्य त्याज्य जड़ चेतन
जीवन मरण ज्ञान अज्ञान
दुर्लभ सुलभ धनी निर्धन
निंदा स्तुति न्याय अन्याय
पाप पुण्य प्राचीन अर्वाचीन
प्रकाश अंधकार बंधन मोक्ष
मान अपमान मूक वाचाल
मितव्यय अपव्यय यश अपयश
राग द्वेष रक्षक भक्षक
लाभ हानि विधि निषेध
वृद्धि ह्रास शयन जागरण
सगुण निर्गुण संधि विग्रह
संयोग वियोग सजीव निर्जीव
सापेक्ष निरपेक्ष सृजन संहार
स्थावर जंगम स्थूल सूक्ष्म
स्वाधीन पराधीन हर्ष विषाद

परीक्षक की दृष्टि: 2022-शैली के प्रश्नों में कम प्रचलित तत्सम शब्दों के विलोम पूछे जाते हैं — ऋजु-वक्र, मूक-वाचाल, संधि-विग्रह, आविर्भाव-तिरोभाव, स्थावर-जंगम जैसे जोड़े प्राथमिकता से याद करें। गलत विकल्प प्रायः पर्यायवाची या मिलती-जुलती ध्वनि वाला शब्द होता है (जैसे 'मूक' के लिए 'मौन' — यह विलोम नहीं, समानार्थी क्षेत्र का शब्द है)।


अनेक शब्दों के लिए एक शब्द (One-word Substitution)

वाक्यांश के स्थान पर एक सटीक शब्द का प्रयोग भाषा को गठा हुआ बनाता है। परीक्षा में वाक्यांश देकर सही शब्द पूछा जाता है; गलत विकल्प मिलती-जुलती रचना वाले होते हैं (अजर/अमर/अजेय)।

H.1 मानक 80 प्रविष्टियाँ

वाक्यांश एक शब्द
जो कहा न जा सके अकथनीय
जिसे जीता न जा सके अजेय
जो कभी बूढ़ा न हो अजर
जो कभी न मरे अमर
जिसका जन्म न हो अजन्मा
जो दिखाई न दे अदृश्य
जिसके समान कोई दूसरा न हो अद्वितीय
जो पहले कभी न हुआ हो अभूतपूर्व
जिसकी उपमा न दी जा सके अनुपम
जो पढ़ा-लिखा न हो अनपढ़ / निरक्षर
जिसके माता-पिता न हों अनाथ
बिना बुलाए आया हुआ (अतिथि) अनाहूत
जिसका कोई आधार न हो निराधार
जो कभी नष्ट न हो अनश्वर / अविनाशी
जिसे क्षमा न किया जा सके अक्षम्य
जो गिना न जा सके अगणित / असंख्य
जहाँ पहुँचा न जा सके अगम्य
बिना वेतन काम करने वाला अवैतनिक
जो विधि (कानून) के विरुद्ध हो अवैध
जो विधि के अनुसार हो वैध
जिसका उपचार (इलाज) न हो सके असाध्य
दूर/आगे की बात सोचने वाला दूरदर्शी
जिसका जन्म पहले हुआ हो अग्रज
जिसका जन्म बाद में हुआ हो अनुज
दोपहर से पहले का समय पूर्वाह्न
दोपहर के बाद का समय अपराह्न
जो आँखों के सामने हो प्रत्यक्ष
जो आँखों के सामने न हो परोक्ष
ईश्वर में विश्वास रखने वाला आस्तिक
ईश्वर को न मानने वाला नास्तिक
जानने की इच्छा जिज्ञासा
जानने की इच्छा रखने वाला जिज्ञासु
जीने की इच्छा जिजीविषा
जीतने की इच्छा जिगीषा
मोक्ष की इच्छा रखने वाला मुमुक्षु
उपकार को मानने वाला कृतज्ञ
उपकार को न मानने वाला कृतघ्न
जिसका आचरण अच्छा हो सदाचारी
जिसका आचरण बुरा हो दुराचारी
दूसरों का हित चाहने वाला हितैषी
मांस खाने वाला मांसाहारी
शाक-सब्जी खाने वाला शाकाहारी
सब कुछ खाने वाला सर्वभक्षी
कम बोलने वाला मितभाषी
मीठा बोलने वाला मृदुभाषी
बहुत बोलने वाला वाचाल
जो सब कुछ जानता हो सर्वज्ञ
जो थोड़ा जानता हो अल्पज्ञ
विदेश में वस्तु भेजना निर्यात
विदेश से वस्तु मँगाना आयात
रात में विचरण करने वाला निशाचर
आकाश में विचरण करने वाला नभचर
जल में रहने वाला जलचर
स्थल पर रहने वाला स्थलचर / थलचर
प्रतिदिन होने वाला दैनिक
सप्ताह में एक बार होने वाला साप्ताहिक
मास में एक बार होने वाला मासिक
वर्ष में एक बार होने वाला वार्षिक
सौ वर्षों का समय शताब्दी
जो क्षण भर में नष्ट हो जाए क्षणभंगुर
इतिहास से संबंधित ऐतिहासिक
जिस पर अभियोग लगाया गया हो अभियुक्त
जिसकी पहले से आशा न की गई हो अप्रत्याशित
जो कम खर्च करता हो मितव्ययी
जो बहुत (व्यर्थ) खर्च करता हो अपव्ययी
हाथ से लिखा हुआ हस्तलिखित
जो साथ पढ़ता हो सहपाठी
गोद लिया हुआ पुत्र दत्तक
जिसका पति मर गया हो विधवा
जिसकी पत्नी मर गई हो विधुर
अच्छे (उच्च) कुल में जन्मा कुलीन
जो कठिनाई से प्राप्त हो दुर्लभ
जो सहज में प्राप्त हो जाए सुलभ
जो पूजा के योग्य हो पूजनीय
जो देखने योग्य हो दर्शनीय
जो वंदना के योग्य हो वंदनीय
अपने बल पर निर्भर रहने वाला स्वावलंबी
दूसरों पर आश्रित रहने वाला पराश्रित / परावलंबी
नगर में रहने वाला नागरिक
गाँव में रहने वाला ग्रामीण

परीक्षक की दृष्टि: इच्छा-परिवार सबसे प्रिय जाल है — जिज्ञासा (जानने की), जिजीविषा (जीने की), जिगीषा (जीतने की), मुमुक्षा (मोक्ष की), पिपासा (पीने की) — चारों विकल्पों में यही रखे जाते हैं। इसी तरह अ-परिवार: अजर (बूढ़ा न हो), अमर (मरे नहीं), अजेय (जीता न जा सके), अज्ञेय (जाना न जा सके) — वाक्यांश की क्रिया से मिलान करें।


मुहावरे और लोकोक्तियाँ (Idioms & Proverbs)

I.1 अंतर समझें

I.2 परीक्षा-स्तरीय 80 मुहावरे (अर्थ-सहित)

मुहावरा अर्थ
अंगूठा दिखाना (अवसर पर) साफ मना कर देना
अंधे की लाठी एकमात्र सहारा
अक्ल का दुश्मन महामूर्ख
अपना उल्लू सीधा करना अपना स्वार्थ सिद्ध करना
आँख का काँटा अप्रिय/खटकने वाला व्यक्ति
आँखों का तारा अत्यंत प्रिय
आँखें चुराना सामना करने से कतराना
आँखें दिखाना क्रोध प्रकट करना, धमकाना
आँखों में धूल झोंकना धोखा देना
आकाश से बातें करना बहुत ऊँचा होना
आग-बबूला होना अत्यधिक क्रोधित होना
आस्तीन का साँप विश्वासघाती (कपटी) मित्र
ईंट से ईंट बजाना पूरी तरह नष्ट कर देना
ईंट का जवाब पत्थर से देना करारा जवाब देना
ईद का चाँद होना बहुत दिनों बाद दिखाई देना
उँगली पर नचाना वश में रखना
उल्टी गंगा बहाना रीति के विरुद्ध कार्य करना
एड़ी-चोटी का जोर लगाना पूरी शक्ति लगा देना
कमर कसना (कार्य के लिए) तैयार होना
कलेजे पर साँप लोटना ईर्ष्या से जल उठना
कान भरना चुगली करना
कान पर जूँ न रेंगना कोई असर न होना
खाक छानना दर-दर भटकना
खरी-खोटी सुनाना भला-बुरा कहना
खून का घूँट पीना क्रोध/अपमान चुपचाप सह जाना
गड़े मुर्दे उखाड़ना बीती बातें फिर छेड़ना
गागर में सागर भरना थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कहना
गुड़-गोबर करना बना-बनाया काम बिगाड़ देना
घड़ों पानी पड़ना अत्यंत लज्जित होना
घाव पर नमक छिड़कना दुखी को और दुखाना
घी के दीये जलाना खुशियाँ मनाना
चार चाँद लगाना शोभा बढ़ा देना
चिकना घड़ा होना निर्लज्ज होना (कोई असर न होना)
छक्के छुड़ाना बुरी तरह पराजित करना
छाती पर मूँग दलना पास रहकर कष्ट देना
जान हथेली पर रखना प्राणों की परवाह न करना
टेढ़ी खीर कठिन कार्य
टोपी उछालना अपमानित करना
तिल का ताड़ बनाना छोटी बात को बहुत बढ़ाकर कहना
तूती बोलना धाक/प्रभाव जमा होना
थाली का बैंगन सिद्धांतहीन, पक्ष बदलने वाला
दाँत खट्टे करना बुरी तरह हराना
दाँतों तले उँगली दबाना चकित रह जाना
दाल न गलना युक्ति सफल न होना
दाल में काला होना संदेह होना
दूध का धुला पूर्णतः निर्दोष
धूप में बाल सफेद करना बिना अनुभव के आयु बिता देना
नमक-मिर्च लगाना बढ़ा-चढ़ाकर कहना
नाक में दम करना बहुत परेशान करना
नाकों चने चबवाना खूब परेशान कर देना
नौ दो ग्यारह होना भाग जाना
पानी-पानी होना बहुत लज्जित होना
पापड़ बेलना कठिन संघर्ष/परिश्रम करना
पेट में चूहे कूदना बहुत जोर की भूख लगना
पहाड़ टूट पड़ना भारी विपत्ति आ जाना
फूला न समाना अत्यधिक प्रसन्न होना
बाएँ हाथ का खेल अत्यंत सरल कार्य
बाल-बाल बचना बड़ी कठिनाई से बच जाना
बाट जोहना प्रतीक्षा करना
बगुला भगत ढोंगी, पाखंडी
भीगी बिल्ली बनना डरकर दब जाना
मक्खी मारना बेकार बैठे रहना
मुँह की खाना बुरी तरह हारना
मुँह में पानी आना खाने को जी ललचाना, लालच होना
मुट्ठी गरम करना रिश्वत देना
मैदान मारना विजय प्राप्त करना
राई का पहाड़ बनाना छोटी बात को बहुत बड़ा बना देना
रंग में भंग पड़ना आनंद में विघ्न आना
रफूचक्कर होना भाग जाना
लोहा मानना श्रेष्ठता स्वीकार करना
लोहे के चने चबाना अत्यधिक कठिनाई झेलना
श्रीगणेश करना शुभारंभ करना
सिर पर चढ़ाना अधिक लाड़ से बिगाड़ देना
सोने पे सुहागा अच्छे में और अच्छे का योग
हवा से बातें करना बहुत तेज दौड़ना
हवाई किले बनाना काल्पनिक योजनाएँ बनाना
हथेली पर सरसों जमाना असंभव-सा काम तुरंत चाहना
हाथ मलना पछताना
हाथ-पाँव मारना (बचने/पाने का) प्रयत्न करना
हाथों के तोते उड़ना (आकस्मिक दुःख से) घबरा जाना

I.3 परीक्षा-स्तरीय 40 लोकोक्तियाँ (अर्थ-सहित)

लोकोक्ति अर्थ
अंधों में काना राजा मूर्खों के बीच थोड़ा ज्ञानी भी श्रेष्ठ माना जाता है
अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत समय निकल जाने पर पछताना व्यर्थ है
अधजल गगरी छलकत जाए अल्पज्ञ/ओछा व्यक्ति अधिक दिखावा करता है
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता अकेला व्यक्ति बड़ा काम नहीं कर सकता
आम के आम गुठलियों के दाम दोहरा लाभ
आगे कुआँ पीछे खाई दोनों ओर विपत्ति
उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे अपराधी का निर्दोष पर रोब जमाना
ऊँट के मुँह में जीरा आवश्यकता की तुलना में बहुत कम
एक पंथ दो काज एक साधन से दो कार्य सिद्ध होना
एक अनार सौ बीमार वस्तु एक, चाहने वाले अनेक
ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर कठिन कार्य ठान लिया तो बाधाओं का भय कैसा
का वर्षा जब कृषि सुखानी अवसर बीत जाने पर साधन व्यर्थ
काला अक्षर भैंस बराबर निरा अनपढ़ होना
खोदा पहाड़ निकली चुहिया परिश्रम बहुत, फल थोड़ा
गंगा गए गंगादास, जमुना गए जमुनादास अवसरवादी व्यक्ति
घर की मुर्गी दाल बराबर अपनी वस्तु का मूल्य कम आँका जाता है
घर का भेदी लंका ढाए भेद जानने वाला अपना ही विनाश कराता है
चार दिन की चाँदनी, फिर अँधेरी रात क्षणिक सुख
चोर की दाढ़ी में तिनका अपराधी सदा शंकित रहता है
जल में रहकर मगर से बैर आश्रयदाता से शत्रुता उचित नहीं
जहाँ चाह वहाँ राह दृढ़ इच्छा हो तो उपाय निकल आता है
जिसकी लाठी उसकी भैंस बलवान की ही चलती है
जैसी करनी वैसी भरनी कर्म के अनुसार फल मिलता है
जितनी चादर हो, उतने पैर पसारो आय के अनुसार ही व्यय करो
डूबते को तिनके का सहारा संकट में थोड़ी सहायता भी बहुत होती है
दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है धोखा खाया व्यक्ति अति सतर्क हो जाता है
दूर के ढोल सुहावने दूर की वस्तुएँ अच्छी लगती हैं
थोथा चना बाजे घना गुणहीन ही दिखावा अधिक करता है
न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी कारण मिटा दो तो कार्य होगा ही नहीं
नाच न जाने आँगन टेढ़ा काम स्वयं न आए और दोष साधनों पर मढ़ना
नेकी कर दरिया में डाल उपकार करके भूल जाना
नौ नकद न तेरह उधार अधिक उधार से थोड़ा नकद अच्छा
बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद अनाड़ी गुण का मूल्य नहीं समझता
मन चंगा तो कठौती में गंगा मन शुद्ध हो तो घर ही तीर्थ है
मान न मान मैं तेरा मेहमान जबरदस्ती गले पड़ना
लातों के भूत बातों से नहीं मानते दुष्ट दंड से ही सुधरते हैं
सौ सुनार की, एक लुहार की अनेक हल्के प्रयत्नों पर एक प्रभावी प्रहार भारी
साँप भी मरे, लाठी भी न टूटे काम भी बन जाए और हानि भी न हो
हाथ कंगन को आरसी क्या प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं
होनहार बिरवान के होत चीकने पात होनहार के लक्षण पहले ही दिखने लगते हैं

परीक्षक की दृष्टि: प्रश्न में मुहावरे का अर्थ पूछा जाता है और गलत विकल्प शाब्दिक अर्थ (literal meaning) का होता है — 'पेट में चूहे कूदना' के लिए "पेट में जीव होना" जैसा विकल्प जाल है; मुहावरे का अर्थ सदा लाक्षणिक लें। दूसरा पैटर्न: अर्थ देकर सही मुहावरा/लोकोक्ति पूछना, या वाक्य में रिक्त स्थान पर उपयुक्त मुहावरा भरवाना। समान अर्थ वाले जोड़े साथ याद करें — भाग जाना = नौ दो ग्यारह होना / रफूचक्कर होना; लज्जित होना = पानी-पानी होना / घड़ों पानी पड़ना।


शब्द-शुद्धि (वर्तनी की शुद्धता)

J.1 प्रश्न-स्वरूप

चार वर्तनियों में से शुद्ध रूप चुनना होता है (या चार शब्दों में से अशुद्ध)। 2022 के प्रश्नपत्र में जिन शब्दों के शुद्ध रूप पूछे गए, वे नीचे [2022] से चिह्नित हैं — ये चारों दोबारा पूछे जाने योग्य "प्रिय" शब्द हैं।

J.2 60 अशुद्ध → शुद्ध जोड़े

अशुद्ध ✗ शुद्ध ✓ अशुद्ध ✗ शुद्ध ✓
चिन्ह चिह्न [2022] ब्रम्ह ब्रह्म [2022]
श्रृंगार शृंगार [2022] निराभिमान निरभिमान [2022]
अनुग्रहीत अनुगृहीत उज्वल उज्ज्वल
कवियित्री कवयित्री पूज्यनीय पूजनीय (अथवा पूज्य)
प्रज्जवलित प्रज्वलित महत्व महत्त्व
लक्षमी लक्ष्मी श्रीमति श्रीमती
सन्यासी संन्यासी अन्तर्ध्यान अंतर्धान
अनाधिकार अनधिकार अत्याधिक अत्यधिक
आर्शीवाद आशीर्वाद उपरोक्त उपर्युक्त
निरिक्षण निरीक्षण परिक्षा परीक्षा
प्रदर्शिनी प्रदर्शनी विरहणी विरहिणी
सौहार्द्र सौहार्द अतिश्योक्ति अतिशयोक्ति
अगामी आगामी अध्यन अध्ययन
अभिष्ट अभीष्ट अनिष्ठ अनिष्ट
आधीन अधीन उज्जयनी उज्जयिनी
उन्नती उन्नति ऋषी ऋषि
कुमुदनी कुमुदिनी क्योंकी क्योंकि
गृहणी गृहिणी जेष्ठ ज्येष्ठ
ज्योत्सना ज्योत्स्ना तदोपरांत तदुपरांत
तिथी तिथि दयालू दयालु
दृष्टा द्रष्टा धैर्यता धैर्य (या धीरता)
नमष्कार नमस्कार पैत्रिक पैतृक
प्रमाणिक प्रामाणिक बुद्धिवान बुद्धिमान
मंत्रीमंडल मंत्रिमंडल मिष्ठान्न मिष्टान्न
मैथलीशरण मैथिलीशरण युधिष्ठर युधिष्ठिर
रचयता रचयिता रात्री रात्रि
वाल्मीकी वाल्मीकि व्यवहारिक व्यावहारिक
शताब्दि शताब्दी श्रोत स्रोत (उद्गम के अर्थ में)
संसारिक सांसारिक सप्ताहिक साप्ताहिक
स्वास्थ स्वास्थ्य हितेषी हितैषी

दो रूप प्रचलित होने पर: महत्त्व (मानक) — महत्व भी व्यापक प्रचलन में; संन्यासी/सन्न्यासी दोनों मान्य; तत्त्व (मानक) — तत्व प्रचलित; पूज्य और पूजनीय दोनों शुद्ध हैं, अशुद्ध केवल "पूज्यनीय" है। परीक्षा में वही विकल्प चुनें जो मानक (संस्कृत-सम्मत) हो।

J.3 शुद्धता के पाँच सूत्र

  1. शृ बनाम श्रृ: शृंगार, शृंखला में श + ऋ की मात्रा है — 'र्' नहीं; "श्रृ" लिखना सदा अशुद्ध।
  2. ह्न / ह्म / ह्य: चिह्न (ह् + न), ब्रह्म (ह् + म), बाह्य (ह् + य) — 'ह' पहले आता है; "चिन्ह", "ब्रम्ह" अशुद्ध।
  3. ऋ की मात्रा: गृहिणी, अनुगृहीत, पैतृक, मातृ, कृपा — 'रि' नहीं, 'ृ' लगेगी।
  4. इ/ई और उ/ऊ की मात्राएँ: परीक्षा, निरीक्षण, प्रतीक्षा में दीर्घ 'ई'; उन्नति, तिथि, ऋषि, रात्रि, वाल्मीकि के अंत में ह्रस्व 'इ'; श्रीमती, शताब्दी के अंत में दीर्घ 'ई'।
  5. उपसर्ग-जन्य रूप: उपर्युक्त (उपरि + उक्त — "उपरोक्त" अशुद्ध), अत्यधिक (अति + अधिक), अनधिकार (अन् + अधिकार), निरभिमान (निः + अभिमान — "निराभिमान" अशुद्ध)।

परीक्षक की दृष्टि: 2022 में पैटर्न था — "निम्नलिखित में से शुद्ध शब्द कौन-सा है?" और चारों विकल्प एक ही शब्द की चार वर्तनियाँ (जैसे: श्रृंगार / शृंगार / श्रंगार / शृंगर)। ऐसे में ऊपर के पाँच सूत्रों से जाँचें। ध्यान रहे — आधे से अधिक अशुद्धियाँ केवल तीन जगह होती हैं: (क) ऋ/रि, (ख) इ/ई, (ग) संयुक्ताक्षर का क्रम (ह्न/न्ह)।


वाक्य-शुद्धि (Sentence Correction)

K.1 बारह सामान्य अशुद्धि-प्रकार

  1. लिंग संबंधीदही खट्टी है ✗ → दही खट्टा है ✓ (दही, पानी, मोती पुल्लिंग; चिड़िया, सरकार, पुस्तक स्त्रीलिंग)।
  2. वचन संबंधीप्राण निकल गया ✗ → प्राण निकल गए ✓ (प्राण, दर्शन, आँसू, हस्ताक्षर, समाचार, लोग — सदा बहुवचन में प्रयुक्त)।
  3. कारक-चिह्न संबंधीमेरे को बुलाओ ✗ → मुझे बुलाओ ✓।
  4. 'ने' का अशुद्ध प्रयोग/लोपराम फल खाया ✗ → राम ने फल खाया ✓ ('ने' सकर्मक क्रिया के भूतकाल में अनिवार्य); अकर्मक में 'ने' नहीं — वह हँसा ✓ (अपवाद: खाँसना, छींकना, थूकना, नहाना — उसने छींका ✓)।
  5. सर्वनाम संबंधीहमारे को यह पसंद है ✗ → हमें यह पसंद है ✓।
  6. विशेषण संबंधीअनेकों छात्र ✗ → अनेक छात्र ✓ ('अनेक' स्वयं बहुवचन है); प्रत्येक छात्रों ✗ → प्रत्येक छात्र ✓ ('प्रत्येक', 'हर' के साथ एकवचन)।
  7. क्रिया/काल संबंधीमैंने कल जाना है ✗ → मुझे कल जाना है ✓।
  8. पदक्रम (शब्द-क्रम) संबंधीएक गिलास पानी का लाओ ✗ → पानी का एक गिलास लाओ ✓।
  9. पुनरुक्ति (द्विरुक्ति) दोष — एक ही अर्थ के दो शब्द: केवल सिर्फ, लौटकर वापस आना, सज्जन पुरुष, गोपनीय रहस्य, प्रातःकाल के समय — एक शब्द हटाना अनिवार्य।
  10. अनुपयुक्त शब्द-चयनविद्वान स्त्री ✗ → विदुषी ✓; स्वर्गीय जीवित के लिए ✗।
  11. योजक/अव्यय संबंधीयद्यपि... लेकिन ✗ → यद्यपि... तथापि ✓ (जोड़े: यदि–तो, यद्यपि–तथापि, न केवल–अपितु/बल्कि)।
  12. मुहावरे का रूप बिगाड़ना — मुहावरे के शब्द बदले नहीं जाते: एड़ी-चोटी का पसीना एक करना ✗ (दो मुहावरों का घालमेल) → एड़ी-चोटी का जोर लगाना ✓।

K.2 पंद्रह अशुद्ध → शुद्ध वाक्य

अशुद्ध वाक्य ✗ शुद्ध वाक्य ✓ दोष
मुझे केवल सिर्फ दो दिन चाहिए। मुझे केवल दो दिन चाहिए। पुनरुक्ति
वह लौटकर वापस आ गया। वह लौट आया। पुनरुक्ति
गीता ने पुस्तक पढ़ा। गीता ने पुस्तक पढ़ी। लिंग-अन्वय (क्रिया कर्म के अनुसार)
राम फल खाया। राम ने फल खाया। 'ने' का लोप (सकर्मक भूतकाल)
मेरे को यह पुस्तक चाहिए। मुझे यह पुस्तक चाहिए। कारक-चिह्न
वह अनेकों बार यहाँ आया। वह अनेक बार यहाँ आया। विशेषण (अनेक स्वयं बहुवचन)
प्रत्येक छात्रों को पुरस्कार मिला। प्रत्येक छात्र को पुरस्कार मिला। वचन (प्रत्येक + एकवचन)
दही बहुत खट्टी है। दही बहुत खट्टा है। लिंग (दही पुल्लिंग)
उसने हस्ताक्षर किया। उसने हस्ताक्षर किए। वचन (हस्ताक्षर बहुवचन)
मैं आपका दर्शन करने आया हूँ। मैं आपके दर्शन करने आया हूँ। वचन (दर्शन बहुवचन)
वह एक विद्वान स्त्री है। वह एक विदुषी है। शब्द-चयन (विद्वान का स्त्रीलिंग विदुषी)
यद्यपि वह बीमार था, लेकिन परीक्षा दी। यद्यपि वह बीमार था, तथापि उसने परीक्षा दी। योजक-जोड़ा
एक गिलास पानी का लाओ। पानी का एक गिलास लाओ। पदक्रम
वह सज्जन पुरुष है। वह सज्जन है। पुनरुक्ति ('सत् + जन' में पुरुष निहित)
मैंने कल जाना है। मुझे कल जाना है। क्रिया-रचना

परीक्षक की दृष्टि: वाक्य-शुद्धि के प्रश्न में चार वाक्यों में से शुद्ध (या अशुद्ध) वाक्य पहचानना होता है। क्रम से तीन जाँचें कीजिए — (1) कर्ता-क्रिया/कर्म-क्रिया का लिंग-वचन अन्वय, (2) 'ने/को/से' का औचित्य, (3) कोई शब्द दो बार तो नहीं (अर्थ की दृष्टि से)। 'ने' वाले वाक्यों में क्रिया कर्म के लिंग-वचन के अनुसार चलती है — राम ने रोटी खाई (रोटी स्त्रीलिंग → खाई)।


अलंकार, रस, छंद (परिचयात्मक)

L.1 अलंकार

काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्व अलंकार कहलाते हैं (अलंकरोति इति अलंकारः)। दो वर्ग —

(क) शब्दालंकार — चमत्कार शब्द पर टिका हो (शब्द बदलते ही अलंकार समाप्त)।

अलंकार लक्षण उदाहरण
अनुप्रास वर्णों की बार-बार आवृत्ति "चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में" ('च' की आवृत्ति)
यमक एक शब्द दो या अधिक बार, अर्थ हर बार भिन्न "कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय॥" (कनक = धतूरा / सोना)
श्लेष शब्द एक ही बार, पर अर्थ अनेक (श्लेष = चिपकना) "रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून॥" (पानी = चमक, मान/प्रतिष्ठा, जल)

(ख) अर्थालंकार — चमत्कार अर्थ पर टिका हो।

अलंकार पहचान-सूत्र उदाहरण
उपमा उपमेय की उपमान से समानता; वाचक शब्द — सा, सी, सम, सरिस, जैसा "पीपर पात सरिस मन डोला" (मन की तुलना पीपल के पत्ते से)
रूपक उपमेय पर उपमान का आरोप (अभेद) — वाचक शब्द नहीं "चरण-कमल बंदौ हरि राई" (चरण ही कमल); "अंबर-पनघट में डुबो रही, तारा-घट ऊषा नागरी"
उत्प्रेक्षा उपमेय में उपमान की संभावना/कल्पना — वाचक शब्द: मानो, मनु, जनु, जानो "सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनौ नीलमनि सैल पर, आतपु परयौ प्रभात॥"
अतिशयोक्ति बात को लोक-सीमा से बहुत बढ़ाकर कहना "हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग। लंका सिगरी जल गई, गए निसाचर भाग॥"

झट-पहचान: 'सा/सम/सी/सरिस' दिखे → उपमा; उपमेय-उपमान एक कर दिए जाएँ ('चरण-कमल') → रूपक; 'मानो/जनु/मनु' दिखे → उत्प्रेक्षा; असंभव-सी बढ़ा-चढ़ी बात → अतिशयोक्ति; एक शब्द बार-बार भिन्न अर्थों में → यमक; एक बार आकर भी कई अर्थ → श्लेष; एक वर्ण की आवृत्ति → अनुप्रास

L.2 रस

काव्य को पढ़ने-सुनने-देखने से प्राप्त आनंदानुभूति रस है; रस को "काव्य की आत्मा" कहा गया है। रस के चार अंग — स्थायी भाव (मन में सदा विद्यमान मूल भाव), विभाव (भाव जगाने वाले कारण — आलंबन/उद्दीपन), अनुभाव (बाहरी चेष्टाएँ), संचारी/व्यभिचारी भाव (आते-जाते सहायक भाव, संख्या 33)।

रस और उनके स्थायी भाव (परीक्षा की सर्वप्रिय तालिका):

रस स्थायी भाव रस स्थायी भाव
शृंगार रति भयानक भय
हास्य हास वीभत्स जुगुप्सा (घृणा)
करुण शोक अद्भुत विस्मय (आश्चर्य)
रौद्र क्रोध शांत निर्वेद
वीर उत्साह वात्सल्य वत्सलता (संतान-प्रेम)

L.3 छंद

वर्ण/मात्रा की गिनती, यति-गति के नियम से बँधी रचना छंद कहलाती है। मात्रा गिनती में ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ) = 1 मात्रा (लघु), दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) = 2 मात्राएँ (गुरु)।

छंद स्वरूप मात्रा-क्रम उदाहरण
दोहा अर्धसम मात्रिक; 2 पंक्तियाँ, 4 चरण विषम चरण (1, 3) में 13; सम चरण (2, 4) में 11 "श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि"
चौपाई सम मात्रिक; 4 चरण प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥"
सोरठा दोहे का उल्टा विषम चरण में 11; सम चरण में 13 "मूक होइ वाचाल, पंगु चढ़इ गिरिबर गहन"

स्मरण-सूत्र: दोहा = 13-11, सोरठा = 11-13 (दोहे का विपर्यय), चौपाई = 16-16। दोहे में तुक सम चरणों (2, 4) में मिलती है, सोरठे में विषम चरणों (1, 3) में।

परीक्षक की दृष्टि: इस खंड से प्रायः एक ही प्रश्न आता है और वह तीन में से किसी एक रूप में — (1) पंक्ति देकर अलंकार पूछना (वाचक शब्द खोजिए — 'सा' → उपमा, 'मानो' → उत्प्रेक्षा), (2) रस का स्थायी भाव (वीर-उत्साह, शांत-निर्वेद, वीभत्स-जुगुप्सा सबसे अधिक पूछे जाते हैं), (3) दोहा/सोरठा/चौपाई की मात्राएँ। तीनों तालिकाएँ रट लें — यहाँ समझ से अधिक स्मृति काम आती है।


परीक्षक की दृष्टि (पूरे अध्याय पर)

  1. शुद्ध वर्तनी का प्रश्न लगभग निश्चित है — एक ही शब्द की चार वर्तनियाँ दी जाती हैं। 2022 में चिह्न, ब्रह्म, शृंगार, निरभिमान पूछे गए; इसी परिवार के अगले उम्मीदवार — उज्ज्वल, कवयित्री, अंतर्धान, आशीर्वाद, उपर्युक्त, अनुगृहीत।
  2. कारक में 'से' और 'को' के दो-दो दावेदार — करण/अपादान तथा कर्म/संप्रदान का भेद ही पूछा जाता है; क्रिया का भाव (साधन? अलगाव? देना?) देखकर उत्तर दें।
  3. संधि/समास में "निकटवर्ती भेद" वाले विकल्प — गुण के साथ वृद्धि, यण के साथ अयादि, कर्मधारय के साथ बहुव्रीहि, द्विगु के साथ बहुव्रीहि रखे जाते हैं; पहचान-सूत्र (जोड़ पर बना स्वर; विग्रह का ढाँचा) लगाइए।
  4. विलोम/पर्यायवाची में तत्सम शब्दावली — ऋजु, मूक, स्थावर, आविर्भाव, संधि जैसे शब्द; गलत विकल्पों में पर्यायवाची या समान ध्वनि वाले शब्द होते हैं।
  5. मुहावरे का शाब्दिक अर्थ ही सबसे बड़ा जाल — अर्थ सदा लाक्षणिक चुनें; लोकोक्ति के प्रश्न में मिलते-जुलते भाव वाली दूसरी लोकोक्ति भी विकल्प में रहती है।
  6. वाक्य-शुद्धि में प्रायः पुनरुक्ति या लिंग-वचन अन्वय — "केवल सिर्फ", "लौटकर वापस", 'ने' के बाद क्रिया का कर्म से अन्वय — यही तीन बातें अधिकांश प्रश्न निपटा देती हैं।

सामान्य त्रुटियाँ

  1. "श्रृंगार" को शुद्ध मान लेना — शुद्ध रूप शृंगार है (श + ऋ की मात्रा); यही नियम शृंखला पर भी।
  2. "चिन्ह" और "ब्रम्ह" लिखना — संयुक्ताक्षर में 'ह' पहले आता है: चिह्न, ब्रह्म (वैसे ही: जिह्वा, बाह्य, आह्वान)।
  3. हर 'से' को करण मान लेना — गिरना/निकलना/डरना/अलग होना हो तो वह अपादान है।
  4. हर 'को' को कर्म मान लेना — देने का भाव या "के लिए" का अर्थ हो तो संप्रदान
  5. नीलकंठ, पीतांबर, चतुर्भुज को कर्मधारय/द्विगु कहना — जब अर्थ शिव/विष्णु (कोई तीसरा) हो, समास बहुव्रीहि है।
  6. दशानन को द्विगु समझना — संख्या से शुरू होकर भी यह रावण का बोधक है → बहुव्रीहि
  7. "उपरोक्त" को शुद्ध मानना — मानक रूप उपर्युक्त (उपरि + उक्त) है।
  8. "अनेकों", "प्रत्येक छात्रों" जैसे प्रयोग — 'अनेक' स्वयं बहुवचन; 'प्रत्येक/हर' के साथ एकवचन।
  9. दोहा-सोरठा की मात्राएँ उलट देना — दोहा 13-11; सोरठा 11-13; चौपाई 16-16।
  10. यमक और श्लेष का घालमेल — शब्द दुहराया जाए (अर्थ बदलते हुए) = यमक; शब्द एक बार आकर अनेक अर्थ दे = श्लेष।

संक्षिप्त पुनरावृत्ति-पत्र (Rapid Revision Sheet)

1. कारक-चिह्न grid

कारक चिह्न झट-पहचान
कर्ता ने क्रिया करने वाला
कर्म को जिस पर फल पड़े
करण से, के द्वारा साधन
संप्रदान को, के लिए देना / जिसके लिए
अपादान से अलगाव
संबंध का, की, के किसका
अधिकरण में, पर स्थान/समय
संबोधन हे! अरे! पुकार

2. स्वर संधि पहचान-सूत्र

जोड़ पर दिखे संधि उदाहरण
आ / ई / ऊ (दीर्घ) दीर्घ विद्यालय, गिरीश, सूक्ति
ए / ओ / अर् गुण नरेंद्र, महोत्सव, महर्षि
ऐ / औ वृद्धि सदैव, महौषध
य् / व् / र् + स्वर यण अत्यधिक, स्वागत, पित्राज्ञा
अय् / आय् / अव् / आव् अयादि नयन, गायक, पवन, पावक

3. समास पहचान

सूत्र समास
पहला पद अव्यय (यथा-, आ-, प्रति-, भर-) अव्ययीभाव
विग्रह में विभक्ति लौटे (को/से/के लिए/का/में) तत्पुरुष
विशेषण-विशेष्य या उपमा का मेल कर्मधारय
पहला पद संख्या + समूह-बोध द्विगु
विग्रह में "और/या" द्वंद्व
"जिसका... वह" — तीसरे का बोध बहुव्रीहि

4. रस — स्थायी भाव (एक पंक्ति में)

शृंगार-रति · हास्य-हास · करुण-शोक · रौद्र-क्रोध · वीर-उत्साह · भयानक-भय · वीभत्स-जुगुप्सा · अद्भुत-विस्मय · शांत-निर्वेद · वात्सल्य-वत्सलता

5. छंद: दोहा 13-11 · सोरठा 11-13 · चौपाई 16-16

6. शीर्ष-30 शुद्ध वर्तनियाँ (अंतिम दोहराव हेतु)

शुद्ध रूप शुद्ध रूप शुद्ध रूप शुद्ध रूप शुद्ध रूप
चिह्न ब्रह्म शृंगार निरभिमान अनुगृहीत
उज्ज्वल कवयित्री पूजनीय प्रज्वलित महत्त्व
लक्ष्मी श्रीमती संन्यासी अंतर्धान अनधिकार
अत्यधिक आशीर्वाद उपर्युक्त निरीक्षण परीक्षा
प्रदर्शनी विरहिणी सौहार्द अतिशयोक्ति आगामी
गृहिणी ज्येष्ठ द्रष्टा व्यावहारिक हितैषी

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